Monday, February 6, 2017

इश्क की राहों पे चलकर...


इश्क की राहों पे चलकर पाया क्या
सोच कर यह तू कभी पछताया क्या

इश्क में जीना ओ मरना आया क्या
सामने थी मौत तब घबराया क्या

जब हुआ दीदार तुझको यार का
 दिल की अपनी बात तू कह पाया क्या

बादलों की ओट से झांका जो चांद
नजरों से नजरें मिलीं शरमाया क्या

इश्क को कहते हैं दरिया आग का
दो कदम भी आग में चल पाया क्या

जब चढ़ाया सूली पे जल्लाद ने
गीत उसके नाम तू गा पाया क्या

---  शिवशंकर

Friday, January 29, 2016

कविता - शंबूक



शंबूक वध नहीं था अंतिम वह
चलता रहा सिलसिला अनवरत
आजादी के इतने सालों बाद भी
देता रहा संविधान दुहाई
समानता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की
वेधकर व्यंग के तीक्ष्ण तीरों
उपहास की बर्छियों से
प्रताड़ित करते रहे शंबूक को
लगाकर आरोप तरह तरह के
बोलो रखकर हाथ दिल पर
पीटते रहोगे ढ़ोल कब तक
आधुनिकता प्रगतिशीलता का
देकर साथ शंबूक की हत्यारी व्यवस्था का


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Tuesday, November 17, 2015

बड़ा कठिन है



सच से अब अलग झूठ को करना बड़ा कठिन है
पहचान दोस्त दुश्मन की करना बड़ा कठिन है

है जोरों पे मिलावट जमाखोरी का चलन
फंदे से बच निकलना अब लगता बड़ा कठिन है

रावण भी आये सामने प्रभु राम बन के जब
बच बचके रहना धोखे से हरदम बड़ा कठिन है

कोई नहीं सुरक्षित अब आतंकवाद से
फौरी इलाज से मिटे दिखता बड़ा कठिन है

बोके बबूल ख्वाब आम के न देखिये
कांटो से इनके बचना सचमुच बड़ा कठिन है


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Wednesday, September 30, 2015

रास्ते



मंजिलों की फिक्र किसको जब हसीं हों रास्ते
उम्र भर चलता रहूं ना खत्म हों ये रास्ते

आंखें हटती ही नहीं मंजर सुहाना इस कदर
जुल्फों के खम जैसे टेढ़े मेढ़े हैं ये रास्ते

कभी रेलम पेल है तो कभी सन्नाटा अजब
कभी तो मुझको मिले हैं ऊंघते ये रास्ते

कभी ऊंचे शिखर तक घाटी से फिर मैदान पर
कभी तो नदियों के संग संग चलते जाते रास्ते

रास्तों से दोस्ती करली बने ये हमसफर
चलते चलते जाने कब मंजिल बने ये रास्ते


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Tuesday, September 22, 2015

विज्ञापन



अब न हमले तोप से होते ना ही तलवार से
बच के रहिये आप इन विज्ञापनों के वार से

बंद करलें लाख फाटक खिड़कियां घर की सभी
फिर भी घुस आते घरों में कत्ल करने प्यार से

आप चाहें या न चाहें मिलेंगे हर राह पर
होर्डिंगों से झांकते या फिर किसा दीवार से

नन्हें मुन्ने हैं निशानों पर विज्ञापन के जनाब
आप बच ना पायेंगे बच्चों की जिद की मार से

 हां कहा तो सीधा हमला हो रहा है जेब पर
कुछ भी हो सकता है घर में आपके इंकार से


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Wednesday, September 2, 2015

लघु कथा --- जहर



 क्लास में विज्ञान के टीचर ने बच्चों से पूछा कि वे जहर के बारे में जो जानते हों बतायें। किसी बच्चे ने बिच्छू के जहर के बारे में बताया तो किसी ने सांप के जहर के बारे में जानकारी दी। एक बच्चे ने पोटैशियम साइनाइड का जिक्र करते हुए कहा, सर यह सबसे घातक जहर होता है।
 तभी क्लास में कई दिनों से गुमसुम रहने वाली पिंकी अचानक खड़ी हुई और बोली सर अभी तक जितने भी जहर बताये गये हैं उन सबसे ज्यादा खतरनाक जाति का जहर है। कुछ दिन पहले मेरे पड़ोस के एक अंकल ने रक्षाबंधन पर अपनी बेटी दामाद को घर बुलाया। घर आते ही उन पर अपने भाइयों, बेटों के साथ जानलेवा हमला कर दिया। जानते हैं क्यों. क्योंकी बेटी ने दूसरी जाति के अपने इंजीनियर सहपाठी से शादी कर ली थी।  


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Saturday, August 1, 2015

सामयिक दोहे --- मानसून सत्र



 संसद की मानसून सत्र का पहला सप्ताह तो हंगामे की भेंट चढ़ ही चुका, दूसरा सप्ताह भी उसी राह पर है। इसी संदर्भ में हैं ये चंद पंक्तियां

बहस न होती सदन में हंगामा भर होय
दशा देख दोउ सदन की मतदाता रहा रोय

मानसून का सत्र जा रहा है यों बेकार
दोनो जब जिद पर अड़े दिखे यही आसार

हंगामा करते वहां जहां बहस का काम
चोट पैर में लगी है माथे मलते बाम

अफसर झाड़ें अफसरी संसद करे न काम
नइया ऐसे देश की पार लगाये राम


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